चीन, भारत और तुर्की वह देश हैं जो ईरान से सबसे बड़े तेल ख़रीदार देश हैं। इन देशों ने भी खामोशी साध रखी है, ट्रम्प प्रशासन और उसके बड़बोले नेताओं जैसे माइक पोम्पेयो और जान बोल्टन को भी मानो सांप सूंघ गया है। इससे भी बड़ी बात यह है कि हुरमुज़ स्ट्रेट से गुज़रने वाले अमरीकी जहाज़ और युद्धक नौकाएं ईरानी पासदाराने इंक़ेलाब फ़ोर्स के सवालों के जवाब देने पर मजबूर हैं। हुरमुज़ स्ट्रेट की रक्षा और देखभाल इसी फ़ोर्स के हाथ में है और वह वहां से गुज़रने वाले जहाज़ों से उनकी पहिचान और उनके सामान के बारे में सवाल करती है जबकि इन नौकाओं और जहाज़ों को इन सवालों के जवाब देने होते हैं।
यह बात सही है कि चीन, भारत और दक्षिणी कोरिया ने ईरान से खरीदे जा रहे तेल की मात्रा में कमी की है लेकिन बात यह है कि अमरीका तो धमकियां दे रहा था कि वह एक बैरल तेल भी नहीं बिकने देगा और आज भी ईरान का तेल बिक रहा है तो इसका मतलब साफ़ है कि अमरीकी धमकी खोखले शब्दों से अधिक कुछ नहीं है।
यह बात भी ध्यान योग्य है कि शुक्रवार को अमरीका की सरकार चीन, रूस और यूरोपीय संघ के दबावों से सामने झुकने पर मजबूर हुई और उसने ईरान के साथ अराक, बूशहर, फ़ोर्दू और तेहरान परमाणु केन्द्रों में सहयोग करने वाले पांच देशों को प्रतिबंधों से छूट देने का एलान किया। क्या परमाणु मामले में प्रतिबंधों से कुछ देशों को छूट देने का यह मतलब है कि अमरीका एक बार फिर तेल के मामले में भी कुछ देशों को छूट देने की तैयारी कर रहा है?
सच्चाई तो यह है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की समझ में अब कुछ भी नहीं आ रहा है कि वह क्या करें? वह युद्धोन्मादी स्वभाव के अपने सहयोगियों के जाल में बुरी तरह फंस गए है। वह ईरान के ख़िलाफ़ अपनी धमकियों पर अमल नहीं कर पा रहे हैं। यहां तक कि वह उत्तरी कोरिया का भी कुछ नहीं बिगाड़ सके तो फिर चीन और रूस की बात ही अलग है। उधर वेनेज़ोएला में विद्रोह करवाने की पूरी अमरीका योजना धराशायी हो चुकी है।
उत्तरी कोरिया ने तो जापान सागर में कम दूरी के मिसाइल का परीक्षण भी कर दिया जिसका उद्देश्य अमरीका को तैश दिलाना है। यह परीक्षण उत्तरी कोरिया के नेता किम जोंग उन की रूस यात्रा के बाद किया गया।
ईरान के प्रतिरोध ने हक़ीक़त में ख़ुद अमरीका और उसके प्रतिबंधों की नाकाबंदी कर दी है। अमरीका की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है। ईरान से एक एक बैरल तेल का निर्यात अमरीका के मुंह एक एक तमाचे की तरह पड़ रहा है।
हमें यह नहीं पता कि इस स्थिति पर अमरीका का जवाब क्या होगा और यह भी नहीं मालूम कि राष्ट्रपति ट्रम्प कब इस मामले में अपनी ख़ामोशी तोड़ेंगे और कब आकर ट्वीट करेंगे लेकिन इतना तो पता है कि ईरान के मामले में ट्रम्प और उनकी सरकार को लगातार पराजय हो रही है।
ट्रम्प के प्रतिबंधों और धमकियों से तेल की क़ीमत 75 डालर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इससे ओपेक का अस्तित्व ख़तरे में आ गया क्योंकि इस संस्था से ईरान जैसे कई सदस्य देश बाहर निकल सकते हैं और दुनिया भर में तेल के बाज़ार में ऊहापोह की स्थिति पैदा हो सकती है।
तो क्या इस स्थिति में डोनल्ड ट्रम्प अपने उस्ताद नेतनयाहू के इशारे पर कोई बड़ी मूर्खता करेंगे? शायद न्यूयार्क टाइम्ज़ में छपने वाला कार्टून इस मामले में बड़ी सच्चाई बयान कर रहा है। इस कार्टून में ट्रम्प को अंधा दिखाया गया है जो नेतनयाहू का हाथ पकड़े रास्ता चल रहे हैं। नेतनयाहू ट्रम्प के साथ ही अमरीका को बड़ी गहरी खाई में गिराएंगे।
अब्दुल बारी अतवान
अरब जगत के प्रख्यात लेखक व टीकाकार